दिमाग में पानी भरने से क्या होता है?HealthPlanet

Posted on Wed 30th Nov 2022 : 13:06

दिमाग की थैलियों में ज्यादा पानी भर जाने से होती है हाइड्रोकेफेल्स बीमारी

गोरखपुर, जेएनएन। हाइड्रोकेफेल्स मस्तिष्क की एक गंभीर बीमारी है। यह बच्‍चों में ज्यादा होती है। लेकिन बड़ों को भी प्रभावित कर सकती है। दिमाग की थैलियों में पानी भर जाने से यह बीमारी होती है। इसका इलाज संभव है। समय से इलाज न शुरू होने पर यह गंभीर हो जाती है। मस्तिष्क कार्य करना बंद कर देता है। जान भी जा सकती है।

इंदौर में गोरखपुर के एक बच्‍चे की इसी बीमारी से जान चली गई। हालांकि वह हवाई जहाज से माता-पिता के साथ बेंगलुरु इलाज के लिए ही जा रहा था। विशेषज्ञों के अनुसार मस्तिष्क में पानी की चार थैलियां होती हैं। जिनमें पानी पैदा होता रहता है। सभी थैलियां एक-दूसरे से पाइप के जरिये जुड़ी होती हैं। पाइप से पानी एक-दूसरे थैली में जाता रहता है। अंतत: वह रीढ़ की हड्डी से होता हुआ शरीर में चला जाता है। जब किसी पाइप का छिद्र किसी कारण से बंद या संकरा हो जाता है तो संबंधित थैली में पानी भरने लगता है। ज्यादा पानी जमा हो जाने से वहां सूजन आ जाती है। दिमाग दबने लगता है जिससे वह काम करना कम कर देता है। आगे चलकर वह निष्क्रिय हो जाता है। ज्यादा पानी भर जाने से दिमाग के अलावा सांस की नली व दिल पर भी दबाव पड़ता है। ऐसी स्थिति में मृत्यु हो सकती है।

प्रमुख कारण

दिमाग के अंदर किसी तरह की रुकावट से यह बीमारी जन्मजात हो सकती है। दिमाग की टीबी होने से, समय से पूर्व पैदा हुए बच्‍चों के मस्तिष्क में खून बहने से, ब्रेन ट्यूमर होने से और ब्रेन हैमरेज होने पर भी यह बीमारी हो सकती है।

क्‍या है लक्षण

बच्‍चों में सिर का आकार सामान्य से ज्यादा बड़ा होना। सिर सामान्य से ज्यादा तेजी से बढऩे लगता है। सिर के तालू का अगला हिस्सा फूला दिखना। सिर दर्द, उल्टी, सुस्ती। आंखों की पुतली नीचे की तरफ दिखाई देने लगती है और झटका व चिड़चिड़ापन इसके प्रमुख लक्षण हैं। न्यूरोलाजिस्ट डा. अनुराग कुमार सिंह का कहना है कि इस बीमारी का इलाज संभव है। बच्‍चों व बड़ों दोनों को यह प्रभावित करती है। बच्‍चों में जन्मजात व बड़ों में दुर्घटना या दिमाग की टीबी के कारण हो सकती है। लगभग पांच सौ में किसी एक को यह होती है। बीआरडी मेडिकल कालेज में बाल रोग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. भूपेंद्र शर्मा का कहना है कि यह बीमारी बच्‍चों में ज्यादा होती है। हर माह इस बीमारी से ग्रसित चार-पांच बच्‍चे आते हैं। जब भी इसके लक्षण दिखें तो तत्काल डाक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय से इलाज शुरू होने पर यह ठीक हो जाती है।

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